महिमा गठबंधन की, पंडित सुरेश नीरव

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आदमी का स्वभाव होता है कि वह किसी भी बंधन को पसंद नहीं करता ।और सही कहें तो खाली आदमी ही क्या कोई भी प्राणी बंधन पसंद नहीं

पंडित सुरेश नीरव

करता।बंधन तो बंधन ही है।चाहे पिंजरे का हो या गले में पड़े पट्टे का।बंधन सिर्फ़ मजबूरी में ही सहे जाते हैं।आदमी अपनी मन मर्जी से तमाम ऊलजलूल गीत गाएगा,गीत गा-गाकर नहाएगा मगर उसे गाने या नहाने के लिए मजबूर करोगे तो उसका पारा चढ़ जाएगा।यह ज़बरदस्ती ही एक प्रकार का बंधन है। जैसे कुछ लोगों के लिए फिल्म में राष्ट्रगीत बजाना या राष्ट्र गीत के सम्मान में खड़े होना या वंदे मातरम गाना एक प्रकार का अमानवीय और नृशंस बंधन है। कुछ शरीफ लोगों को तो रक्षा बंधन भी बंधन ही नजर आता है।आजकल तो संबंध भी बंधन हो गया है जो स्वेच्छा से किसी को नहीं भाता है, इसलिए खुशी-खुशी कौन संबंध निभाता है।

 

बस बंधन तो इश्क का ही है जो लोगों को भाता है या नेता हो तो वह जरूर जरूरत पड़ने पर गठबंधन को  भरपूर ललचाता है। ड्यूटी पर काम करने का बंधन न हो तोआप ही बताइए बिना बंधन के कौन काम करना चाहता है?आजकल राजनीति में जिन्होंने गठबंधन  किया भी है तो वे इस गठबंधन की जंजीर को फटाफट तोड़ देना चाहते हैं। पल-पल में बंधनग्रस्त  मन कभी उद्घव ठाकरे होता है तो कभी चंद्राबाबू नायडू तो कभी रामभर।हर किसी के मन से एक ही विलाप आलाप लेता सुनाई देगा कि जा गठबंधन ने बड़ौ दुख दीनौ रे।बड़ी अजीब है इस गठबंधन की माया।जिसने गठबंधन किया वो पछताया और जिसने नहीं किया वो गठबंधन को ललचाया।अखिलेश कांग्रेस से गठबंधन कर पछता रहे हैं तो शरद पंवार गठबंधन के लिए नई बिसात बिछा रहे हैं।दोनों तरफ बस बेचैनी का आलम है।

मगर गठबंधन तो बस बंधन ही होता है फिर चाहे  वह मेहबूबा से ही क्यों न हो! मेहबूबा से गठबंधन कर ले तो मीर भी कश्मीर हो जाता है।गठबंधन में कब किसका पलड़ा बीस हो जाए और कब कौन नीतीश हो जाए किसको पता रहता है?वैसे इस गठबंधन से कब कौन कहाँ बच पाया है?अगर राजनीति वोट और नोट का गठबंधन है तो गांठ बांध लो इस सचाई से कि हमारा यह जीवन भी जिस्म और रूह का महा गठबंधन ही तो है।सरकार बनाने के लिए भी गठबंधन और सरकार गिराने के लिए भी गठबंधन।केवल यही एक बंधन है जिसकी गांठ कोई ढीली नहीं करना चाहता वर्ना बंधन कौन चाहता है?

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