Acharya Manoj Awasthi Ji Maharaj

ये कहाँ आ गए हम!!

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सभ्यता के ढोल पीटते-पीटते हम आज पतन के जिस मोड़ पर आकर खड़े हो गये हैं वहां सभ्यता के ढोल पीटने के बजाय. अब तो अपना माथा पीटने और छाती कूटने के आयोजन ज्यादा  सांस्कृतिक और सामयिक लगने लगे हैं।हर तरफ अनैतिकता का छाया  हुआ काला धुंध है और इंसानियत बुरी तरह फ्लाप होकर कुंद है।हिंसा का रूप विकराल है,चारों तरफ फैला अराजकता का जाल है। मगर कमाल है!! सोच से लापता हुआ मलाल है।और-तो-और इस लज्जा सर्ग में बेशर्मी का चेहरा भी शर्म से लाल है।हो सकता है कुछ तथाकथित ऋषि-मुनियों की संतानों को सबकुछ ठीक-ठाक लग रहा हो और वो शुतुरमर्गीय निर्मल आनंद से हरे-भरे हों मगर हालात के हाहाकारी अट्टहास इतने तीव्र डेसीबल के हैं कि बहरों को भी अपने कानों में शर्मिंदगी की रुई ठूंसनी पड़ रही है। रोज-रोज रिश्तों का चीरहरण हो रहा है,कहीं खेल-खेल में हिंसा तो कहीं मजाक-ही-मजाक में अपहरण हो रहा है।

स्त्री सशक्तीकरण के दौर में स्त्री-तो-स्त्री अबोध कन्याएं तक अपने ही सगे-संबंधियों की हवस का शिकार हैं। पैसों के लालच में रोज बड़े-बूढ़े मारे जा रहे है।और मुर्दा लोग हर स्थिति में परिस्थिति को स्वीकारे जा रहे हैं।पर्यावरण के प्रदूषण ने बचपन की मासूमियत को इतना प्रदूषित कर दिया है कि मीडिया में दिहाड़ी की परोसी जा रही हिंसा ने तीन साल के बालक को भी कातिल बना दिया है।सेल्फी की संस्कृति ने नौनिहालों को इतना सेलफिश बना दिया है कि स्कूल में एक अदद छुट्टी की खातिर दोस्त अपने ही दोस्त विद्यार्थी की हत्या कर देता है।वासना के खिलौने, कदहीन बौने अपनी आठ महीने की अबोध भतीजी से बलात्कार करने में भी नहीं हिचक रहे हैं।

अवैध संबंधों की फसल लहलहाने के लिए माँ अपने ही बच्चों की हत्या कर रही हैं और बेटी अपनी बेसहारा माँ से जायदाद के कागजों पर जबरन दस्तखत कराने के लिए उसे हथकड़ियों से बांधकर महीनों भूखा मरने को मजबूर कर रही है।कलयुगी पिता बाप-बेटी के रिश्तों को तार-तार कर रहा है।सीसीटीवी वाच कर रहे हैं।आश्रमों में बाबा नंगानाच कर रहे है।जरायमपेशा बहुएं पैसे के लालच में दहेज के झूठे मुकदमें लिखा रही हैं।नग्नताएं आखें दिखा रही हैं।सचमुच हम उस देश के वासी हैं,जहां दर-दर खड़ी उदासी हैं। जहां देश के रक्षकों को ही आत्मरक्षा का अधिकार नहीं है उन पर हत्या के मुकदमे दर्ज हो रहे हैं और रहनुमा चैन से सो रहे हैं।अपने ही देश में तिरंगा फहराने पर नौजवान को मार दिया जाता है, और आतंकी शान से बिरयानी खाता है।तभी तो कहना पड़ रहा है कि-
खेल नंगेपन का पूरी शान पर है, आजकल यारो पतन उत्थान पर है।

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