Acharya Manoj Awasthi Ji Maharaj

हमने दुनिया को बुद्ध दिया

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भारत के बाहर चीन ,जापान ,  थाईलैंड आदि देशो मे बौद्ध दर्शन का प्रसार हुआ ! बौद्ध भिक्षु लेकर गये ! इन देशों में बौद्ध दर्शन के साथ साथ एक और कला भी गयी वो थी ..” मार्शल आर्ट ” की !
मार्शल आर्ट ..अर्थात्  ” युद्ध-कला ” । शारीरिक शक्ति व मानसिक शक्ति मे तादात्म्य स्थापित करने वाली कला ! फिल्मों के माध्यम से जब हम चीन या थाईलैंड के बौद्ध मंदिरो को देखते हैं तो वहाँ ” मार्शल आर्ट ” का अभ्यास करते भिक्षु ( मोंक ) भी दिखाई पड़ते हैं ! चीन के  ” शाउलिंग टेम्पल ” मे बुद्ध की प्रतिमाएँ दिखती हैं ..लेकिन साथ ही साथ ” मार्शल आर्ट ” का अभ्यास भी दिखाया जाता हैं !
इतिहास के अनुसार चीन में शाउलिंग टेम्पल की स्थापना पल्लव राजवंश के एक राजकुमार बोधि धर्मन ने की थी .. उन्होंने ही ..मार्शल आर्ट चीनियो को सिखाया था ! चीन , जापान , थाईलैंड आदि में बोधि धर्मन के बारे में बच्चा बच्चा जानता है ! हमने हांगकांग व चाईना मे बनी ” मार्शल आर्ट ” पर  बहुत सी फिल्मे देखी है। इन फिल्मो में बुद्ध को शक्ति के प्रेरक के रूप में ही निरुपित किया जाता हैं !
फिल्मो में निरुपित किया जाता हैं कि ..बुद्ध की उपासना करते हुए ” मार्शल आर्ट ” अभ्यास करते भिक्षु असीम शक्ति अर्जित करता हैं ! कोई उसे युद्ध में हरा नहीं सकता ! लेकिन भारत में ???  बुद्ध को कैसे निरुपित किया जाता है ?? करुणा से भरा हुआ ऐसा व्यक्ति जिसे कोई भी ठोक के चला जाये …वो कुछ नहीं बोलेगा ?
भारत में जिस तरह का बुद्धिज्म के स्वरूप को प्रचारित किया गया ..उसे देख कर क्या कोई कह सकता हैं कि ”  मार्शल आर्ट्स ” का प्रसार बौद्ध भिक्षुओं ने किया था ??  हमारी सारी कला ..पर एकपक्षीय गांधीवाद के नाम पर अहिंसा की ऐसी विकृत विचारधारा इस तरह थोप दी गयी कि .जिसका अर्थ महज इतना हैं कि .हम थप्पड़ खाते रहे …और गाल घुमाते रहे ..कोई प्रतिकार न करे ??
जबकि वास्तविक दर्शन में आक्रमण के बलपूर्वक प्रतिकारक को कभी हिंसा माना ही नहीं जा सकता हैं ! क्योंकि ये समस्त जीवित प्राणियों का सहज स्वभाव है ! और विदेश में जिस बौद्ध दर्शन का प्रसार हुआ उसमें कदाचित् ये अहिंसा का वही स्वरूप था जिसमें बलपूर्वक प्रतिकार को हिंसा माना ही नहीं गया !? इसीलिये बौद्ध ‌भिक्षु  शक्ति अर्जन हेतु ” मार्शल आर्ट ” का अभ्यास करते दिखलाये जाते हैं !  क्या हममे ये स्वीकार करने का साहस हैं कि हमने दुनिया को बुद्ध दिये और उनके साथ दिया ” युद्ध-कला ” बोनस में ??  या हम गांधीवाद के नाम पर थोपी गयी अहिंसा के विकृतिपूर्ण सिद्धांत से इस तरह ग्रसित हो चुके हैं कि इस सच को भी न स्वीकारे ??                                                                                                                                                            -कुमार पवन

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