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धौंस का पर्याय प्रेस!

हमारे देश में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ‘प्रेस’ को माना गया है। संभवत: इसीलिए अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे ज्यादा उपयोग करने की स्वतंत्रता भी इसी स्तंभ को सौंपी गई है। ऐसा शायद इसलिए किया गया ताकि समाज और सत्ता के बीच एक संतुलन बना रहे। और समाज की आवाज सत्ता के कानों तक पहुंचती रहे। आजादी की लड़ाई में योगदान की बदौलत इस स्तंभ ने भरोसा भी कमाया था। लेकिन शायद यह उम्मीद किसी को भी नहीं रही होगी कि ‘प्रेस’ की आजादी एक दिन ‘धौंस’ का पर्याय बन जाएगी। समाज और सरकार के बीच की ये कड़ी ‘दलाल’ का रूप धारण कर लेगी। मित्रों मेरी बात तीखी जरूर है लेकिन सच के काफी करीब है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण वो वाहन हैं जिन पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘प्रेस’ लिखा रहता है। बड़े-बड़े महानगरों से लेकर गांवों तक आपकों एक बड़ी संख्या में ‘प्रेस’ लिखीं हुर्इं गाड़ियां दिखाई देंगी। जबकि हकीकत में ‘प्रेस’ से इनका दूर-दूर तक कोई संबंध भी नहीं होता। मजेदार बात तो यह है कि कुछ लोग तो ‘प्रेस’ लिखबाने के लिए पैसा तक खर्च करते हैं। कई मीडिया संस्थान भी अपना परिचय पत्र जारी करने की एक फीस वसूलते हैं जिसे अदाकर ‘डग्गेमार’ वाहन चालक आसानी से प्राप्त कर लेते है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों किसी गाड़ी पर प्रेस लिखा होना चाहिए? संभवत: यह सिर्फ सड़क पर मौजूद दूसरे लोगों और खासकर पुलिस प्रशासन पर अपनी धौंस जमाने का सबसे सस्ता और कारगर हथियार है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर किसी गाड़ी पर आज तक बार्बर, सिंगर, या परचून विक्रेता कोई क्यों नहीं लिखवाता। हां राजनीति के क्षेत्र से जुड़े और पुलिस प्रशासन से जुड़े लोगों को जरूर पुलिस, सांसद, विधायक, पार्षद जैसे पदनाम गाड़ी पर लिखाए हुए देखा जा सकता है। इनका मंतव्य भी सीधे-सीधे रौब से ही जुड़ा होता है। खैर हम यहां बात सिर्फ ‘प्रेस’ की कर रहे हैं। वो इसलिए क्योंकि मैं स्वयं इसी पेशे से संबंध रखता हूं। वैसे मेरे कुछ पत्रकार मित्र मेरी बात से सहमत हुए बिना अपना यह तर्क भी देंगे कि रिपोर्टिंग के लिए पहचान जरूरी है। लेकिन मित्रों मेरा विरोध ‘प्रेस’ लिखे होने से नहीं उसके दुरूपयोग से है। मेरा विरोध उन लोगों से है जो इस शब्द का बेजा इस्तेमाल कर समर्पित पत्रकारों की छवि को भी बिगाड़ रहे है। सोचकर देखिए एक पत्रकार जब महज एक चाय की खातिर किसी नेता के यहां चाटुकार की भूमिका में नजर आता है तो उस कलम के सिपाही पर क्या गुजरती होगी जिसने अपने लहू को स्याही बनाकर जन आवाज को आंदोलन का रूप दे दिया। कभी सोचा है आपने जब कोई किसी पत्रकार को कौड़ियों के भाव बिकने वाला बताकर अपमानित करता है तो कितनी कुंठा और ग्लानि अपने ही पेशे के प्रति होती है।
यहां सवाल यह है कि आखिर इन परिस्थितियों का जिम्मेदार कौन है? बहुत हद तक वो संस्थान जो अपने परिचय पत्र बेंच रहे हैं और मुख्य तौर पर सरकार की वह व्यवस्था जिसके तहत बिना कोई ठोस जानकारी जुटाएं हर किसी को अखबार या पत्रिका प्रकाशित करने की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है। ये पत्र या पत्रिकाएं भी फसलों की तरह मौसमी होते हैं। होली, दीपावली, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, इनके प्रकाशन का सही मौसम होता है। क्योंकि कुछ छुटभैया नेताओं की चाटुकारी से शुभकामना संदेश के नाम पर पैसा इसी मौसम में जुटाया जा सकता। ऐसे ही लोग पैसा जुटाने के लिए परिचय पत्रों का सौदा करते हैं कोई 2000 रुपए वसूलता है तो कोई पांच हजार। महीने में 10 परिचय पत्र भी बेच दिए तो चल गई इनकी दुकान। क्या ऐसे गैर जिम्मेदार और असमर्थ लोगों को प्रकाशन का अधिकार सौंपना उचित माना जा सकता है जो लोग कुछ भी विकल्प न मिलने पर, अन्य कोई काम कर लेने में असफल रहने की कुंठा में पत्रकार बन गए हैं? इन्हीं लोगों की वजह से हर तीसरा व्यक्ति ‘पत्रकार’ का रौब झाड़ रहा है। और उन कलम के सिपाहियों को अपमानित कर रहा है। जिन्होंने कलम की मर्यादा बनाए रखने के लिए अपना जीवन खपा दिया। मैं ऐसे बहुत से पत्रकार बंधुओं को जानता हूं जिनके बच्चों के स्कूल की फीस समय पर अदा नहीं होती लेकिन फिर भी वे कभी अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करते।
लोकतंत्र में चूंकि सत्ता ‘लोक’ में समाहित है, अत: जरूरी ये है कि पत्रकार की जिम्मेदारी समाज के प्रति हो। लेकिन घटना और व्यक्ति के बीच माध्यम बने पत्रकार अगर दलाल का काम करने लगें तो ऐसे तत्वों को पत्रकारिता से बाहर का रास्ता दिखाने हेतु प्रयास किया ही जाना चाहिए। अगर कोई पत्रकार षड्यंत्रों को उजागर करने के बदले खुद ही साजिशों में संलग्न हो जाय तो जागरूक पत्रकारों को चाहिए कि ऐसे तत्वों को निरुत्साहित कर इस क्षेत्र से ही बाहर धकेलने का प्रयास करें। सरकार को भी चाहिए कि पत्रकार कहलाने की मंशा रखने वाले हर व्यक्ति की जांच की जाय, उचित मानदंड तय किए जाएं। उचित मानक पर खरे उतरने वाले व्यक्ति को ही ‘पत्रकार’ के रूप में मान्यता दी जाय। इनके लिए उचित वेतनमान तय किया जाय। इस प्रक्रिया से चुने हुए पत्रकार को सीधे-सीधे मान्यता प्राप्त पत्रकार का दर्जा दिया जाय। ताकि पेशे के प्रति ईमानदारी का जज्बा लोगों के दिलों में धड़कता रहे।
ये कैसी स्वतंत्रता
कैसा सशक्तीकरण?
नारी स्वतंत्रता और सशक्तीकरण की दुहाई देकर कई महिला बुद्धिजीवी टीवी चैनलों पर पुरुषों को चुनौती देती दिखाई देती हैं।असल में देखा जाय तो पिछले 10-15 सालों में जब से इलैक्ट्रानिक मीडिया की बाढ़ आई है, बहुत सी छुपी हुई बातें दर्शकों की आंखों में जबदस्ती आंधी की धुंध की तरह घुसकर रह गर्इं हैं। इसी दौर में मीडिया का बहुत बड़ा जुमला नारी समानता, लिंग समानता, नारी अधिकार, नारी सुरक्षा बनकर उभरा। सही और गलत को बिना सोचे-समझे सिर्फ टीआरपी के दृष्टिगत समाज को दिशाहीन कर देने वाली बहसे चटपटे सवालों के साथ दर्शकों को परोसी जाती रहीं। लेकिन स्त्री आजादी वास्तव में क्या है इसका सही-सही पैमाना आज तक मीडिया या बुद्धिजीवी कोई भी तय नहीं कर सका।
अगर देखा जाय तो स्त्री-देह सदियों से पुरुषों के आकर्षण का केन्द्र रही है। इसके लिए आप चाहें तो प्रकृति को भी दोषी मान सकते हैं। क्योंकि स्त्री-पुरुष की शारीरिक संरचनाओं की भिन्नता और उसके प्रति एक-दूसरे का आकर्षण पूर्णत: प्राकृतिक ही है। इसी के आगे प्रगतिवाद और विकासवाद की वकालत शुरू होती है। स्त्री और पुरुष के बीच समानता के अधिकार की बात होती है। बदलते समय के साथ ऐसा हुआ भी है। लड़कियां सभी क्षेत्रों में सफलता पूर्वक आगे बढ़ रहीं हैं। घर की चार-दीवारी से बाहर निकल कर, खुलकर काम करने का अवसर भी इन्हें खूब ही मिल रहा है। फिर भी बार-बार और हर बार पित्रात्मक सत्ता का तंज पुरुष समाज पर कसा जाता है। या किसी सभ्य पुरुष की नेक सलाह भी स्त्री आजादी पर बंदिश नजर आती है तो फिर से एक बार यह तय करना होगा कि आखिर स्त्री स्वतंत्रता के मायने क्या है? इसकी जद कहां तक है? और इसका पैमाना क्या है? कहीं ये आजादी दीपिका पदुकोण की ‘माइ च्वाइस’ से तो प्रेरित नहीं हो रही? जहां यौन स्वच्छंदता के रूप में आजादी परिभाषित की गई है? यदि ऐसा है तो भारतीय संस्कृति के दृष्टिकोण से, उसके सामाजिक ताने-बाने के दृष्टिकोण इसे कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। मेरी इस नकारात्मकता को उन उदाहरणों से संदर्भित किया जा सकता है जिनमें स्वतंत्रता के नाम पर स्वयं को आधुनिक समझने वाली महिलाओं ने स्त्री को एक बाजारू उत्पाद के रूप में प्रतिष्ठित करवा दिया है। जहां आज वह बाजारवाद के चलते स्वयं बाजार में सज रहीं है।
लेकिन यह दुनिया उतनी ही खूबसूरत है जितने कि दूर बजने वाले ढोल की आवाज। क्योंकि परिवार, घर, बच्चों की परवरिश को अपनी गुलामी समझने वाली नारी को टीवी की सेल्यूलाइड चमक तथा पर्दे की रंगीन्ािंयां आजादी का सपना तो दिखा सकती हैं, पर वास्तविक आजादी कभी नहीं दिलवा सकती। यही कारण है कि अपने उत्पाद को बेचने के लिए निर्माता वर्ग नग्न महिला को ही अपनी पसंद बना रहा है। यानि कि नारी सशक्तीकरण के नाम पर नारी देह को ही परोसा जा रहा है। इसमें नारी सम्मान के पैरोकारों को किसी भी प्रकार के शोषण या असम्मान की झलक दिखाई नहीं देती!
इस तरह की स्वतंत्रता की चाह रखने वाली महिलाओं को भी समझना होगा कि महिलाओं को मिलते अधिकर, शिशु प्रजनन संबंधी अधिनियम, परिवार को सीमित रखने का अधिकार तलाकशुदा स्त्री को बच्चा पाने का कानूनी अधिकार, महिलाओं की स्वच्छंद यौन-प्रस्तुति से संभव नहीं हो सकते हैं। इसके पीछे उन लगनशील महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान रहा है। जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए महिला शरीर को आधार नहीं बनाया। स्वयं को उत्पाद बनाकर बाजारवाद के हवाले नहीं किया। इसीलिए तमाम बहसों के बीच विचार इस बात पर भी होना चाहिए कि आधुनिक नारी किस स्वतंत्रता और किस सशक्तीकरण की बात कर रही है? उचित तो यह होगा इस ओर विचार स्वयं स्त्रियां ही करें क्योंकि पुरुषों द्वारा किया गया विचार एक बार फिर तथाकथित नारीवादी समर्थकों को पित्रात्तमक सत्ता की बेड़ियां ही दिखाई देगा। ऐसा करते हुए उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि स्त्री-पुरुष की शारीरिक संरचना मानव जनित नहीं है यह भिन्नता ही तय करती है कि छुरी मक्खन पर गिरे या मक्खन छुरी पर कटना तो सिर्फ एक को ही है…। इसीलिए महिलाओं के लिए सर्वाधिक सुरक्षित घर की चारदीवारी का पैमाना बहुत हद तक सही माने जाएंगे। क्योंकि आधुनिकता कभी यथार्थ को नहीं बदल सकती यह बात आज के अभिभावकों को भी समझने की जरूरत है।
देश
के दामन पर दाग
‘बंधुआ मजदूरी’ यह शब्द ही अपने आप में गरीब की व्यथा कथा का पर्याय बन चुका है। लेकिन फिर भी आजादी के 70 दशक बाद भी देश के करोड़ों लोग बंधुआ मजदूरी के अभिशाप से खुद को मुक्त नहीं करा सके हैं। आज भी र्इंट भट्टों, माचिस के कारखानों, पटाखा उद्योग में बंधुआ मजदूरों को ‘गुलामों’ की तरह खपते हुए देखा जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक, इस समय देश में कोई डेढ़ करोड़ लोग बंधुआ मजदूर के तौर पर जीवन बिताने के लिए अभिशप्त हैं। इक्कीसवीं सदी में जारी यह प्रथा देश और समाज के माथे पर ऐसा बदनुमा दाग है, जिसके लिए सरकार से लेकर सामाजिक तानाबाना तक सभी जिम्मेदार हैं। पिछले साल जारी ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स में भारत को बंधुआ मजदूरों की राजधानी करार दिया गया था।
बंधुआ मजदूरी से जुड़ी महिलाओं की स्थिति और भी ज्यादा भयावह है। ठेकेदार कई बार पूरे परिवार को अग्रिम रकम देकर अपने साथ बंधुआ मजदूरी के लिए सुदूर राज्य में ले जाते हैं। जहां परिवार की महिलाओं का यौन शोषण तक किया जाता है। इनमें से कइयों को देर-सबेर देहर व्यापार के धंधे तक में धकेल दिया जाता है। यहां सवाल यह उठता है कि आखिरकार वो कौन सी मजबूरी है जिसके चलते ये लोग स्वयं का शोषण कराने पर विवश हैं। इस सवाल का जवाब देश की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति और समाज के अमीर और गरीब तबकों के बीच आर्थिक असमानता की लगातार बढ़ती खाई में छिपा है। देश में दहेज के प्रचल ने भी इस प्रथा को बढ़ावा दिया है। इसके लिए युवती के घर वाले ठेकेदार से दहेज के लिए एक मुश्त रकम लेकर उसे बंधुआ मजदूर के तौर पर काम करनें भेज देते हैं। लेकिन ऐसी युवतियों का सफर अक्सर किसी रेडलाइट इलाके में जाकर खत्म होता है।
ऐसा भी नहीं है कि बंधुआ मजदूरी प्रथा पर अंकुश लगाने के लिए देश में कानून नहीं है। संविधान की धारा 23 के तहत मिले मौलिक अधिकारों में साफ कहा गया है कि किसी भी नागरिक से बंधुआ मजदूरी नहीं कराई जा सकती। उसके अलावा सरकार ने 1976 में बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम भी पारित किया था। इसके तहत तीन साल की कैद और दो हजार रुपए के जुर्माने का प्रावधान है। इस कानून को लागू करने की जिम्मेदारी संबंधित जिलाधिकारियों पर है और निगरानी का काम केन्द्रीय श्रम व रोजगार मंत्रालय के जिम्मे हैं। लेकिन इसके बावजूद भी यह प्रथा जस की तस है, तो इसके लिए कानूनों के अमल में कोताही, सामाजिक जागरूकता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव जैसी वजहें जिम्मेदार हैं। अक्सर कभी उत्तर तो कभी दक्षिण भारत में बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराने की खबरें मिलती हैं। लेकिन समुचित पुनर्वास के अभाव में कुछ दिनों बाद वही लोग दोबारा बंधुआ मजदूरी के दलदल में फंस जाते हैं। इसके अलावा दोषी लोगों के खिलाफ भी कोई कड़ी कार्यवाही नहीं होती। इसलिए उनके हौसले बढ़ते रहते हैं।
कुल मिलाकर यदि ये कहा जाय तो उचित ही होगा कि आदिकाल से चली आ रही इस प्रथा को खत्म करने के लिए देश की सरकारों ने कभी गंभीरता से न सोचा और न विचार किया। क्योंकि यदि इस दिशा में गंभीरता दिखाई गई होती तो अमीर और गरीब के बीच इतनी बड़ी असमानता मौजूद नहीं होती। पेट पालने के लिए गरीबों को बेटियों का सौदा न करना होता। उन्हें अनजान, अपरिचित, अव्यवहारिक परिस्थितियों में खुद को झोंकना न पड़ता। चंद रुपयों की खातिर अपना घर,परिवार और समाज छोड़ दूर न जाना होता। मैं पूंछना चाहता हूं देश की सरकारों से कि क्या गरीब होना वाकई अभिशाप है? यदि नहीं, तो फिर 70 दशक बाद भी देश का गरीब अमीर के हाथों बंधुआ क्यों है? और यदि हां, तो आप बार-बार और हर बार गरीबों की हितैषी सरकार होने का दंभ क्यों भरते हो? क्यों आप उनकी भावनाओं से खेलते हो?
नाबालिग ‘प्रेम’ के नादान परिंदे
‘प्यार’ एक ऐसा शब्द जिसकी गहराई आज तक कोई भी नहीं नाप सका। बात जब हीर-रांझा और लैला-मंजनू के प्यार की होती है तो इसमें बंदगी नजर आती है। यही प्यार जब आज की बिंदास पीढ़ी के बीच पहुंचता है तो वासना में डूबा नजर आता है। प्रेम ही जीवन को संचालित करता है, और प्रेम ईश्वर का दूसरा रूप है जैसे वाक्य भी हिन्दी सिनेमा के माध्यम से नित नए रूपों में खूब दोहराए जा रहे हैं। लेकिन इस ‘प्रेम’ में कितनी गहराई है, यह साथी के प्रति समर्पण है या फिर किशोर मन की काम वासना का ज्वार जो विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण को ‘प्रेम’ का स्वरूप प्रदान कर रहा है? इन सवालों का उत्तर न समाज के पास है और न सिनेमा के। हां, सिनेमा इतना कमाल जरूर दिखा रहा है कि उसके द्वारा किया गया प्यार का महिमामंडन, किशोर मन को कुछ इस प्रकार सम्मोहित कर लेता है कि वह ‘प्यार’ के फेर में अपने मां-बाप तक से विद्रोह कर बैठता है।
आज के दौर में किशोर नाबालिग बच्चों का प्रेम प्रसंग उनके माता-पिता के लिए मुसीबत बनता जा रहा है। स्थिति तो यह है कि लगभग 70 प्रतिशत अभिभावक ऐसे मामलों में अदालतों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं। इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति पर अदालत ने भी चिंता जताई है। अदालत मानती है कि बच्चों द्वारा कम उम्र में किए जाने वाले प्यार से न केवल परिजन बल्कि बच्चों का भविष्य भी प्रभावित होता है। हाल में एक बड़ा परिवर्तन यह भी देख गया है कि अब परिवार के दबाव में प्रेमी के खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज कराने वाली 60 प्रतिशत से ज्यादा पीड़िताएं अदालत में आरोपी के प्रेमी होने की बात स्वीकार कर लेती हैं। कभी अंध प्रेम में डूब कर जीवन समाप्त कर लेना तो कभी नाबालिग जोड़ों का घर से भाग कर विवाह कर लेने की प्रवृत्ति भी आम होती दिखाई दे रही है। जबकि किशोर वय बच्चों का यूं विवाह के बंधन में बंधने का निर्णय अपने भविष्य के साथ खिलवाड़ से ज्यादा और कुख भी साबित नहीं होता। क्योंकि वे किशोर जो न तो आर्थिक स्तर पर सक्षम हैं और न ही मानसिक व शारीरिक रूप से परिपक्व कैसे विवाह या प्रेम की गंभीरता को समझ सकते हैं?
अब सवाल यह भी उठता है कि आखिर ऐसी परिस्थितियों के लिए क्या केवल सिनेमा ही जिम्मेदार है? तमाम माथापच्ची करने के बाद समझ में आता है कि हमारी सामाजिक संरचना में हुआ परिवर्तन भी इसका दूसरा महत्वपूर्ण कारण है। आज के दौर की महानगरीय संस्कृति में आम तौर पर देखा जा सकता है कि किस तरह अभिभावकों ने खुद को अपने ही दायरे में सीमित कर लिया है। इसके अलावा अधिक सुविधा संपन्न जीवन जीने की चाहत या दबाव में पति-पत्नी दोनों का कार्य करना बच्चों में एकाकीपन की भावना को गहरा कर रहा है। ‘प्रेम’ एक स्वाभाविक वृत्ति है और किशोरावस्था से गुजर रहा बच्चा जब घर में प्यार और ममत्व से विहीन होता है तो वह उस स्नेह और सानिध्य को घर से बाहर ढूढ़ता है या फिर टीवी से चिपक कर समय बिताता है। यहीं से होती उस ‘प्रेम’ की उत्पत्ति जिसकी परिणति अपनों के प्रति ही विद्रोह का रूप ले लेती है।
असल में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण यूं भी किशोरवय में तेज होता है, उसी आकर्षण को प्रेम समझने की भूल हर वह किशोर कर बैठता है जिसे अपने अभिभावकों का न तो प्यार मिलता है और न ही मित्रवत व्यवहार। चूंकि उम्र का यह दौर ऐसा है जिसमें समझने की क्षमता कम और समझे जाने की जरूरत ज्यादा होती है। इसलिए जब अभिभावक समझनें और समझाने की बजाय अपना कठोर फैसला उन पर लादने की कोशिश करते हैं तो वह सहज ही विद्रोह कर उठता है। यही विद्रोह किशोर प्रेमियों को शादी या आत्महत्या जैसे फैसलों की ओर खींच ले जाता है। यह भी तय है कि किशोर मन के भीतर पनप रही तथाकथित प्रेम की भावना को जोर-जबर्दस्ती से खत्म नहीं किया जा सकता। इसीलिए यदि युवा होती पीढ़ी को जीवन की ऐसी अनहोनी घटनाओं से बचाना है तो उन्हें भावनात्मक संबल देने के साथ-साथ उनसे संवाद भी बनाए रखना होगा। अगर किशोर अपने विपरीत लिंग के साथी से प्रेम करता भी है तो अभिभावकों की कड़ाई उसकी कोई मदद नहीं कर सकती। यहां जरूरत होती है स्नेह की, मित्रवत व्यवहार की और उनके साथ समय बिताने की मां-बाप का प्यार और विश्वास ही किशोरों को भटकाव से रोक सकता है। अंध प्यार की अंधी गली से ‘प्यार’ ही उन्हें वापस ला सकता है।
गौरतलब
अश्विनी कुमार
अक्सर बड़े बुजुर्ग सीख देते हैं कि बेटा, हर चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती। मैं आज जब उनकी इसी सीख की कसौटी पर ‘भारतीय हिंदी फिल्म इंडस्ट्रीज’ को कसता हूं तो उनकी दूरदृष्टि का कायल हो जाता हूं। क्योंकि जिस फिल्म इंडस्ट्रीज को ‘सितारों की दुनिया’ कहा जाता है, उसी दुनिया में से ‘कास्टिग काउच’ जैसे शब्द की भी उत्पत्ति हुई है। कास्टिग काउच यानि कि एक अभद्र प्रस्ताव या एक प्रकार का शोषण। इस शोषण का शिकार होती हैं वे युवतियां जो अपनी आंखों में स्टार बनने और फिल्मी दुनिया में नाम कमाने का सपना लिए हुए इस दूर की चमक के आकर्षण में खिंची चली आती हैं। लेकिन जब पास आती हैं तो उन्हें पता चलता है कि यहां निर्माता, निर्देशक या अभिनेता हर कोई तो उनके सपनों को हकीकत में बदलने का लालच देकर बदले में उनसे अपना बिस्तर गर्म करवाने की चाहत रखता है।
हिंदी फिल्म इंडस्ट्रीज में कास्टिंग काउच काफी समय से एक विवादित विषय रहा है। लेकिन फिर भी कुछ लोग इस सत्य से साफ इंकार करते हैं वहीं कुछ यह भी मानते हैं कि इस घिनौने सच पर अक्सर ‘लाल कार्पेट’ डाल दिया जाता है। लेकिन मेरी नजर इन दोनों से भिन्न फिल्म इंडस्ट्रीज को उस हमाम में खड़ा पाती है जहां हर कोई नंगा ही नजर आता है। मेरी इस सोच के पीछे दो वजह हैं पहली वजह है कास्टिंग काउच की वो फेहरिस्त जिसमें मधुर भंडारकर शक्ति कपूर, अमन वर्मा, दिवाकर बनर्जी, सुभाष घई, राजकुमार संतोषी, सुभाष कपूर, इरफान खान, शाइनी आहूजा जैसे दिग्गजों के नाम शामिल हैं। इन सभी पर शोषण की शिकार हुई स्थापित अभिनेत्रियों तक ने आरोप लगाए हैं ऐसे में कहीं से यह मानने की गुंजाइश ही शेष नहीं रहती कि इसमें कहीं कुछ झूठ भी है।
मेरी दूसरी वजह में वे स्थापित कलाकार हैं जो अक्सर सामाजिक गतिविधियों के लिए समाचारों की सुर्खियां बनते हैं। लेकिन दुखद यह कि उनमें से किसी भी कलाकार ने फिल्म इंडस्ट्रीज की इस कालिख पर कभी कुछ बोलना उचित नहीं समझा। बात चाहे मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन की हो। शाहरूख खान, सलमान खान की हो या फिर सामाजिक जागरूकता के लिए विशिष्ट पहचान रखने वाले आमिर खान की जिन्होंने ‘सत्यमेव जयते’ जैसे कार्यक्रम के जरिए अनेकों सामाजिक कुरीतियों पर कठोर प्रहार ही नहीं किया बल्कि सरकार को भी उस दिशा में उचित कदम उठाने के लिए विवश कर दिया। मगर अफसोस इनमें से किसी भी सितारे को फिल्म इंडस्ट्रीज के इस ‘स्याह पहलू’ पर कभी कुछ बोलते हुए नहीं सुना। इसे क्या माना जाय, क्या ये सभी फिल्म इंडस्ट्री में कास्टिंग काउच के पहलू से अनभिज्ञ हैं या फिर उसके समर्थक? मेरा यह सवाल हर उस व्यक्ति से है जो फिल्मी सितारों को अपना आदर्श मानता है। उन्हें देश का जिम्मेदार नागरिक मानता है। और कभी कभी तो उन्हें अपना भगवान भी मानता है। तो फिर पूंछो उस भगवान से इस अन्याय और अत्याचार पर वो खामोश क्यों हैं? बताओ उसे अत्याचार करने वाला ही नहीं बल्कि देखने वाला भी ‘गुनाहगार’ है। और ऐसा गुनाहगार किसी का भगवान तो दूर इंसान भी कहलाने का हकदार नहीं हो सकता। वह सिर्फ गुनाहगार है, गुनाहगार, शोषित अभिनेत्रियों का, समाज का और अपना आदर्श और भगवान मानने वाले समर्थकों का।
गौरतलब

अश्विनी कुमार
एक आम व्यक्ति जब रोजी-रोटी की तलाश में किसी महानगर का रुख करता है तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उसके बच्चों की शिक्षा होती है। वह अपने बच्चों की शिक्षा पर कोई कोर-कसर इसलिए नहीं छोड़ना चाहता क्योंकि जिन दुश्वारियों का सामना वह कर रहा है उनका सामना उसके बच्चों को न करना पड़े। इसी सोच के तहत वह दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत करता है, लेकिन फिर भी इतना नहीं कमा पाता कि एक साधारण से प्राइवेट स्कूल की फीस वह समय से भर सके। फिर भी पेट काट कर, दूसरे जरूरी खर्चों से समझौता करके वह देर-सबेर स्कूल की फीस भर ही देता है, लेकिन दुखद ये कि प्राइवेट स्कूलों के संचालक दो-चार दिन का विलम्ब भी बर्दास्त नहीं कर पाते। और छात्रों को प्रताणित कर डालते हैं।
अब बात करता हूं स्कूल प्रबंधन की तो मेरी दृष्टि में फीस विलम्ब की वजह से छात्रों को प्रताणित करना छात्रों के प्रति स्कूल प्रबंधन का घोर अन्याय है। क्योंकि हर स्कूल में समय पर फीस अदा न करने पर विलंब शुल्क लेने का प्रावधान होता है। ऐसे में एक ही जुर्म की दो सजाएं क्यों?
यहां स्कूल प्रबंधन का यह तर्क हो सकता है कि यदि हम ऐसा न करें तो अभिभावक फीस जमा करने में और भी लापरवाही बरतेंगे। लेकिन इस तर्क से स्कूल प्रबंधन को यह नहीं भूलना चाहिए कि ट्रांसफर सर्टिफिकेट उनके पास एक ऐसा अचूक हथियार है। जिसे लिए बिना कोई छात्र स्कूल छोड़ ही नहीं सकता। और कोई भी स्कूल उसी समय बकाया राशि आसानी से वसूल सकता है। तो फिर छात्रों की प्रताणना क्यों?
हमारे देश की सरकार भी बाल विकास के तमाम दावे करती है, लेकिन स्कूल प्रबंधन की इस छात्र शोषण नीति की तरफ उसका भी ध्यान नहीं जाता। वह क्यों नहीं सोचती कि यदि किसी गरीब के बच्चे भी अच्छी तरह पढ़-लिख लेंगे, उन्हें अमीरों के बच्चों के समान ज्ञान मिलेगा, तो वे देश के विकास में ही सहायक होंगे। लेकिन यही विडंबना है हमारे देश की, जहां गरीब को सपने साकार करने का कोई अधिकार नहीं है। तभी तो इनके बच्चों के लिए मुफ्त किताबों, मुफ्त भोजन, मुफ्त ड्रेस और मुफ्त पढ़ाई की व्यवस्था उन स्कूलों में की गई है जहां के अध्यापक से पढ़ाने की बजाय जनगणना, मतगणना, पशुगणना जैसे न जाने कितने कार्य कराए जाते हैं। इस बात को और भी स्पष्ट शब्दों में कहा जाय तो यह कि सरकार चाहती ही नहीं कि किसी गरीब का बेटा पढ़-लिखकर अपने अधिकारों की बात करे या समाज के उस वर्ग को चुनौती दे जिसे अभिजात्य कहा जाता है। सरकार गरीब के बच्चों को शिक्षित नहीं, बल्कि साक्षर तक ही सीमित रखना चाहती है।
तभी तो पिछले पांच-छह सालों में ऐसी कई रिपोर्ट आ चुकी है जो प्राथमिक शिक्षा में गुणवत्ता के बेहद दयनीय स्तर का बयान तो करती है लेकिन ऐसी किसी खबर की पुष्टि नहीं करती कि सरकार इसमें सुधार के लिए कुछ ठोस करने जा रही है। उलटे सरकारी स्कूलों में पढ़ाई लिखाई की हालत को देखकर ऐसा लगता है कि गुणवत्ता की कसौटी पर बेहतर शिक्षा मुहैया कराने को लेकर चिंता करना सरकार ने शायद छोड़ दिया है। दूसरी ओर कथित अच्छी शिक्षा तक केवल अच्छी आर्थिक स्थिति वाले तबके की ही पहुंच है। इस दोहरी मानसिकता से ग्रसित हमारे देश के नीति निर्माताओं से मैं यह सवाल पूंछता हूं कि शिक्षा में समानता का अधिकार और शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित किए बगैर क्या देश के बेहतर भविष्य के बारे में आश्वस्त हुआ जा सकता है? यदि हां तो फिर सरकारी स्कूलों में किसी नेता या अधिकारी के बच्चों को पढ़ाना अनिवार्य क्यों नहीं? यदि नहीं, तो प्राइवेट स्कूलों में फीस विलंब के लिए छात्रों की प्रताणना क्यों?
गौरतलब
पिंजरे में सिसकती जिंदगी
अंधेरी और तंग गलियां, हर तरफ बिखरा गंदगी का साम्राज्य सीवेज से उठती बदबू। इसी के बीच खूब सारा मेकअप किए हुए हंसती, मुस्कुराती और चंचल अदाओं से लुभाती सैकड़ों औरतें। यह नजारा हर उस बस्ती का है जो बदनाम भी है और रहीस जादों की हंसी ठिठोलियों से आबाद भी है। लेकिन फिर भी यहां वक्त ठहरा हुआ सा लगता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं देह व्यापार करने वाली उन महिलाओं की जो देह परोस कर पेट पालती हैं। जिनके होठों पर तो मुस्कान बिखरी रहती है लेकिन मन अथाह अंधकार में डूबा रहता है। यह अंधकार पैदा किया है इन बस्तियों के दलालों नें, पुलिस कर्मियों नें और उस सरकारी व्यवस्था नें जिसके चलते इनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा हड़प कर लिया जाता है। दिन-रात शरीर बेचने के बाद भी इनके हिस्से आती है तो ज्यादा से ज्यादा दो वक्त की रोटी और अनेकों बीमारियां।
बात चाहे लाखों की गरीबी दूर करने वाली भारत की नई आर्थिक उन्नति की प्रतीक मुंबई की हो या अपनी नजाकत पर इतराते कोलकता की, देह व्यापार करने वाली महिलाओं का नसीब कहीं भी नहीं बदलता। अगर हम मुंबई के रेड-लाइट एरिया कमाठीपुरा की बात करें तो इस इलाके को एशिया के सबसे बड़े और पुराने रेड लाइट एरिया का गौरब प्राप्त है। यहां लगभग 20 हजार यौन कर्मी 14 गंदी और तंग गलियों की भूल भुलैया में हर पल सिसकने को मजबूर हैं। इसी तरह सारे देश में लगभग 30 लाख से ज्यादा महिलाओं की जिंदगी देह व्यापार पर निर्भर है, लेकिन फिर भी इनके लिए न कोई कानून न कायदा। सरकार है कि सब कुछ देखने और समझने के बावजूद भी इस तरफ से आंखे फेरे हुए है। सरकारी विज्ञापनों में समाज सुधार की वकालत करने वाले अभिनेताओं का भी ध्यान इनकी बदनसीबी की तरफ नहीं जाता। बेशक इस बदनाम पेशे से इन औरतों को निकालना दुस्कर है, लेकिन इनके हितों की रक्षा के लिए सरकार कोई कानून तो बना ही सकती है, कोई सामाजिक संगठन इनके हितों की आवाज तो बुलंद कर ही सकता है। ताकि इनकी कमाई पर कोई दलाल या पुलिस कर्मी डाका न डाले। उसे ये अपने जीवन सतर को सुधारने, बीमारी का इलाज कराने या अपने बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर सकें। मगर अफशोषजनक इतना कि शारीरिक और आर्थिक दोनों ही रूप से लुटने के बावजूद भी ये महिलाएं कानून से न्याय तक नहीं मांग सकती। अगर कोई साहस करे भी तो कैसे? न्याय मांगे तो किसके भरोसे? क्योंकि समाज और सरकार की व्यवस्था में तो इनके लिए कहीं कोई जगह बनी ही नहीं है!
गौरतलब
शिक्षा व्यवस्था की हकीकत
शिक्षा समाज की वो नींव है जिस पर राष्टÑ का भविष्य टिका होता है। देश के शिक्षित नागरकि ही एक मजबूत तथा समृद्ध देश का निर्माण करते हैं। लेकिन हमारे देश में कुकुरमुत्तों की तरह खड़े स्कूल, कॉलेजों ने शिक्षा व्यवस्था को परिहास बना दिया है। आलीशान पांच सितारा सुविधाओं से सुसज्जित ये संस्थान न तो देश को प्रतिभा दे पाने में सक्षम हैं और न ही चरित्रवान नागरकि। इस बात को हम इस उदाहरण से समझ सकते हैं कि संख्या की दृष्टि से भारत की उच्चतर शिक्षा व्यवस्था अमरीका और चीन के बाद तीसरे नंबर पर आती है। लेकिन बात जब गुणवत्ता की होती है तो दुनियां के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय खड़ा दिखाई नहीं देता। यही नहीं भारत के अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस तकनीकी संस्थानों से डिग्री हासिल करने वाले 10 छात्रों में से महज एक ही विश्व मानक पर नौकरी पाने के योग्य होता है। राष्टÑीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद का शोध इस बात को प्रमाणित भी करता है कि हमारे देश के 90 प्रतिशत कॉलेज और 70 प्रतिशत विश्वविद्यालयों का शैक्षिक स्तर निहायत ही कमजोर है। ये आंकड़े महज प्राइवेट विद्यालयों के नहीं है। इसमें वो विद्यालय भी शामिल हैं जो सरकार से मोटी रकम सहायता के रूप में प्राप्त कर रहे हैं।
हमारे देश के ज्यादातर शिक्षण संस्थान तथा महाविद्यालय अपनी झूठी शान बनाने के लिए शिक्षा तथा नैतिकता का चीरहरण कर रहे हैं और एक व्यवसायिक संगठन की तरह पैसा बनाने में लगे हुए हैं। इसके लिए हर रोज नई नीतियों का निर्माण किया जा रहा है। छात्र आपसी प्रतिस्पर्धा के इस कदर शिकार हो रहे हैं कि अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
कुल मिलाकर इन सारी बातों का सार ये कि शिक्षा का वर्तमान प्रारूप समाज और देश के युवा वर्ग को नकारा और अव्यवहारिक बनाने का ही कार्य कर रहा है। इस शिक्षा व्यवस्था में 90-99 प्रतिशत अंक लाने वाले छात्र भी अपने आपको इतना बेबस पाते हैं कि इन्हें किसी अच्छे स्कूल में प्रवेश तक नहीं मिलता। इन छात्रों की विद्वता का प्रमाण इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि इनमें से 70-80 प्रतिशत छात्र देश के प्रथम प्रधानमंत्री और राष्टÑपति के नाम में कंफ्यूज हो जाते हैं। वहीं 40-50 प्रतिशत छात्र वर्तमान प्रधानमंत्री और राष्टÑपति के नाम पर बगलें झांकने लगते हैं। घोर शर्मनाक तो तब और जब इनमें से कई छात्र राष्टÑपति और प्रधानमंत्री के पद के बीच अन्तर ही स्पष्ट नहीं कर पाते हैं। यही नहीं इन्हें स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के बीच भी फर्क पता नहीं होता। ये सारे दुष्परिणाम शिक्षा के व्यवसायीकरण की देन है। जहां जो व्यक्ति इंजीनियर या डॉक्टर नहीं बन पाता वह इंजीनियरिंग कॉलेज और मेडिकल कॉलेज का डायरेक्टर बन जाता है। और अपने आत्म सम्मान एवं मर्यादाओं की परवाह किए बगैर सिर्फ और सिर्फ लाभ कमाने के लिए ही प्रयासरत रहता है। उसे न समाज से कोई सरोकार होता है और न देश से।
गौरतलब
अश्विनी कुमार
अक्सर हमारे समाज में बुजुर्गों की तुलना बरगद के वृक्ष से करते हुए कहा जाता है कि बरगद चाहे जितना बूढ़ा हो जाय, उसकी छांव कभी बूढ़ी नहीं होती। कहने का तात्पर्य ये कि घर के बुजुर्ग मां-बाप चाहे जितने बूढ़े हो जांय उनका प्यार अपनी संतान के लिए कभी कम नहीं होता। लेकिन अब समय बदल गया है। सोच बदल गई है। इसका प्रमाण ये आंकड़े हैं जो बताते हैं कि घर-परिवार के बीच बुजुर्ग मां-बाप की स्थिति कितनी दयनीय होती जा रही है। आंकड़ो के अनुसार हमारे देश में 60 साल से ऊपर की अवस्था वाले बुजुर्गों की संख्या करीब 10 करोड़ है। यानि कि कुल आबादी का 8.2 प्रतिशत। हैरान करने वाली बात यह है कि इस 8.2 प्रतिशत आबादी को देश का युवा सम्हाल नहीं पा रहा है तभी तो देश के 60 प्रतिशत बुजुर्गों को अपनी जीविका चलाने के लिए या तो मेहनत-मजदूरी करनी पड़ रही है या फिर कहीं वृद्धा आश्रम में शरण लेनी पड़ती है। इतना ही नहीं, हमारी नजरें तब और शर्म से झुक जाती हैं जब ये पता लगता है कि विगत कुछ सालों में भुखमरी का शिकार होने वाले लोगों में सर्वाधिक संख्या बुजुर्गों की ही है। और आधुनिकता का लबदा ओढ़े शहरी इलाकों में बेघर होने वाले लोगों में सबसे ज्यादा संख्या भी बुजुर्गों की ही है।
ये आंकड़े बताते हैं कि हमारे समाज में वंसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा अब पूरी तरह से खंडित हो गई है। आज की ‘फ्लैट संस्कृति’ में बुजुर्गों के लिए कोई स्थान बचा ही नहीं है। पीढ़ियों के इस द्वंद में झुर्रिया हाशिए पर पड़ी दिखाई दे रही हैं। आज की युवा पीढ़ी को अपने बुजुर्गों की उस अंतर्वेदना का अहसास तक नहीं होता जिसे वो पल-पल सह रहे हैं। वे यह जानना भी उचित नहीं समझते कि इन्होंने ही हमें जीने की राह दिखाई है। जीने की अपार संभावनाएं भी इन्होंने ही दीं हैं। इन्होंने हमारी हर इच्छा को स्वीकारा। और हर शरारत को हंसी में उड़ा दिया। इन्होंने ही कभी अपनी उंगली का सहारा देकर चलना सिखाया है। कंधे पर बैठाकर दुनिया दिखाई है। जब सफलता की सीढ़ियां चढ़ना शुरू किया तो हर कदम पर इनके मुंह से ‘वाह’ निकलती रही है। हमारे दिल की खुशी इनके चेहरे पर झलकती रही है। लेकिन अब जबकि इन्हें सहारे की जरूरत है तो ये प्यार तो दूर सहानुभूति के भी हकदार नहीं रहे। अगर होते तो इन्हें दुत्कार न सहनी पड़ती। इन्हें वृद्धा आश्रमों में शरण के लिए भटकना न पड़ता। पेट पालने के लिए मजदूरी न करनी पड़ती। असमर्थता में भूखे पेट न सोना पड़ता। आश्चर्य तो तब होता है इतना तिरस्कार, अपमान और बेरूखी सहने के बाद भी जब कभी इन बुजुर्गों का सामना अपनों से होता है तो इनका पहला सवाल होता है कि ‘बेटा खाना खाया कि नहीं?’ खुद का पेट खाली है लेकिन बेटे की भूख की परवाह इन्हें तब भी है। इस परिस्थिति में भी इन्हें यदि यह अहसास होता है कि हमारी संतान कष्ट में है तो इनके मुंह से ‘आह’ ही निकलती है। लेकिन फिर भी युवा हैं कि यह समझने को तैयार ही नहीं कि धरती के स्वर्ग का यदि कहीं आनंद है तो इन्हीं बुजुर्गों के चरणों में है। इन्हीं की सेवा में है। इन्हीं की दुआ में है।
‘ग्लैमर’ की आग में झुलसता ‘कौमार्य’
आज देश में सर्वाधिक ज्वलंत मुद्दा यौन शोषण का है। कहीं नेताओं द्वारा यौन शोषण, कहीं अभिनेता और फिल्म निर्माताओं द्वारा यौन शोषण तो कहीं धर्म स्तंभ की तरह स्थापित तथाकथित बाबाओं द्वारा यौन शोषण। इन तीनों ही बिंदुओं में दो बाते समान है, पहली-शोषक यानि कि शोषण करने वाला कहीं न कहीं आकर्षक आभामंडल का स्वामी है। दूसरी यह कि शोषिता हर जगह आभा मंडल में कैद है। इन सारी बातों का सीधा और सरल सार ये कि ‘आज वही अधिसंख्य लड़कियां या महिलाएं यौन शोषण का शिकार हो रही है जो कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में ‘ग्लैमर’ की चकाचौंध में अपनी आंखें बंद किए हुए हैं।
बात की शुरूआत हम राजनीति की चकाचौंध के ग्लैमर से करते हैं। राजनीति ऐसा क्षेत्र है जहां ताकत और पैसा दोनों ही भरपूर मात्रा में मौजूद हैं। इसीलिए नेता को सत्ता का शक्तिपुंज माना जाता है। इसी शक्ति पुंज के ग्लैमर में कैद अनेक महिलाएं और लड़कियां अपना सर्वस्व लुटा बैठती हैं। ग्लैमर की चकाचौंध में उनकी बंद हुई आंखें ये देख ही नहीं पाती कि जब व्यक्ति के पास ताकत और पैसा आ जाता है तो उसका चारित्रिक पतन शुरू हो जाता है। राजनेताओं के ऐसे ही चारित्रिक पतन के उदाहरणों से भूत और वर्तमान दोनों ही भरे पड़े हैं, इसीलिए उनके नामों का उल्लेख करना मैं यहां उचित नहीं समझता।
इसी तरह फिल्मी दुनिया के ग्लैमर की बात की जाय तो इस मायानगरी की दुनिया ही मायावी है यह तो काजल की ऐसी कोठरी है जिसमें से कोई बे-दाग निकल ही नहीं सका। यहां बड़े-बड़े अभिनेताओं और निर्माता-निर्देशकों पर यौन शोषण के आरोप लगते रहे हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि यहां किसी भी महिला स्ट्रगलर को काम ही तब मिलता है, जब वह अपना शरीर सौंपने के लिए राजी हो जाती हैं। फिल्मी दुनिया का यह घिनौना स्वरूप कई बार मीडिया में उजागर भी हुआ है, लेकिन फिर भी किसी नवयुवती का आकर्षण इस दुनियां की तरफ कम हुआ हो ऐसा नहीं लगता। इसकी वजह ‘ग्लैमर’ का आकर्षण ही है। पैसा और प्रसिद्धि पाने की चाहत में चरित्र की गरिमा का कोई महत्व ही नहीं रह जाता है।
अब बारी आती है सर्वाधिक संवेदनशील और गंभीर धर्मक्षेत्र की। इस क्षेत्र की पैरोकारी करने वाले बाबाओं का भी ‘ग्लैमर’ ऐसा रंग दिखाता है कि तमाम महिलाएं आंख बंद कर सांसारिक सुख, समृद्धि की चाह में उनकी और खिंची चली जाती हैं। इस बात के प्रमाण के तौर पर तमाम संत समागमों में जुटने वाली महिलाओं की भीड़ को देखा जा सकता है। हालांकि आम भारतीय मानता है कि धर्मगुरू चंदन के पेड़ की तरह होते हैं, जिस पर सर्पों के विष का कोई असर नहीं होता। लेकिन, यही भ्रम उसे पतित कर डालता है आस्था का ज्वार और ‘भगवान’ रूप का ग्लैमर उसे कब ठग लेता है इसका पता तो ठगे जाने के बाद ही चलता है।
आज देश का हर नागरिक इन तीनों ही क्षेत्रों के प्रति श्रेष्ठ धारण रखता है, अपने जीवन की आधार शिला इनके आदर्शों पर रखता है। अपने विचार इनके अनुसार परिवर्तित करता है, लेकिन उसे मिलता क्या है सिर्फ छल, कपट और धोखा। ‘ग्लैमर’ की चकाचौंध का धोखा, आस्था में विश्वास का धोखा, और मर्दानगी में नामर्दी का धोखा। जब हर तरफ धोखा ही धोखा है तो फिर यह अंधभक्तिहीन आकर्षण क्यों? अपना शील हरण कराने की बेताबी क्यों?

वो गांव की गलियां…
समय बदला तो गांव की तस्वीर भी बदल गयी, गांव का समाज बदला तो गोधूलि में लिपटा समाजवाद भी किनारा कर गया। बचपन में दिखाई देने वाले अधिकतर विंब जो गांव की पहचान थे, साहित्य के पन्नों में सिमट गए। समय चक्र में बंटे काम घड़ी की सुइयों की तरह संचालित होते थे, सुबह को डंडे के जोर से घूमता कुम्हार का चाक और उस पर रखा मिट्टी का लोथड़ा न जाने कितने आकारों में ढलता और बच्चों के कौतूहल का विषय बनता। दोपहर में लुहारों के हथौड़े की सधी आवाजें राग-रागिनियों को साकार कर उठती। शाम को धूल उड़ाती बैल गाड़ी के पहियों की चर्र-मर्र काम की समाप्ति की घोषणा सी करती सुनाई देती। रात्रि में चौपालों पर सजी बुजुर्गों की महफिल में गूंजने वाली हुक्के की गुड़गुड़ाहट समाजवाद की कहानी सुनाती। लेकिन यह सारे दृश्य अब बदल चुके हैं। कुम्हार का चाक अब कौतूहल नहीं बनता क्योंकि उसकी कला का कोई मूल्य नहीं रहा। लुहारों के हथौड़े भी शांत हैं क्योंकि आधुनिक कृषि यंत्रों ने हथौड़ा की आवश्यकता को समाप्त कर दिया। आधुनिक यात्रा वाहनों ने बैलगाड़ी को भी निरर्थक कर दिया है। और अलगाव की आग में हुक्के की गुड़गुडाहट सुलग कर रह गयी है। बुजुर्गों की महिफलें अब चौपालों पर नहीं सजती, अब तो हर घर में मोबाइल पर गाने गूंजते हैं। जितने घर उतनी धुन न किसी के पास समय और न इतनी आत्मीयता जो लोगों को घरों के बाहर खींच कर चौपालों तक ले आएं।
गांव में रहने वाले किसान का अपना एक ऐसा समाजवाद था जिसे चाचा, ताऊ, बाबा, दादा के रिश्तों से मजबूती प्रदान की गई थी। ये रिश्ते न तो किसी जाति के बंधन में कैद हो पाते थे और न धर्म की संकीर्णता में। मजदूरों को मजदूरी भी नकदी में कम ही मिलती थी। उन्हें पैसे के बदले अनाज और कपड़े दिए जाते थे वो भी छमाही के बाद जब किसान की रबी और खरीफ की फसल तैयार होती है तब। इस व्यवस्था में हर कोई एक दूसरे का पूरक था, एक के बिना दूसरा अधूरा था। तब कोई भूखे पेट नहीं सोता था और न किसी को एकाकी खलती थी। लेकिन आज जब से ग्रामीण समाजवाद को कुत्सित राजनीति ने अपना ग्रास बनाया है तब से ही किसान और मजदूर अपना खाद्यान्न बाजार से खरीदने को मजबूर हुए हैं। वे इसके लिए या तो भ्रष्ट सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर निर्भर हैं या फिर लगातार महंगे होते खुले बाजार पर। विडबंना तो यह है कि आज रातों को भूखे पेट सोने वाले सबसे ज्यादा वही लोग है जो खाद्यान्न उपजाते है। सरकार की मनरेगा जैसी योजनाएं मजदूरों को खेतों से दूर ले गर्इं। खेती के लिए मजदूर तलाशना भूसे के ढेर से सुईढूढ़ने जैसा है।रही-सही कसर प्राकृतिक मार पूरी कर रही है, इसका परिणाम ये कि किसान खेती छोड़ शहरों की तरफ पलायन करने को विवश हैं। आज खाली होते गांव में अब युवा लोग ढूंढे नहीं मिलते। घर के वृद्धों के सहारे खेती की नैया पार लगे तो कैसे? और जो ग्रामीण युवा बेहतर जिन्दगी की तलाश में शहरों की ओर रूख कर गए वो भी सिर्फ झुग्गियों की ही शोभा बन सके हैं। जहां उनके लिए बेहतर रोजगार या सम्मानित जिन्दगी की कोई भी गारंटी नहीं है। ग्रामीण भारत के इन बदले हुए हालातों को देखकर कोई भी भावी पीढियों की दुश्वारियों का अंदाजा लगा सकता है। लेकिन देश की लापरवाह सरकार को शायद यह सब दिखाई ही नहीं देता तभी तो वह आज भी जबरन गांव को वैश्विक बाजार के साथ जोड़ने पर आमादा है। जबकि आवश्यकता इस बात की है कि बिना किसी भेदभाव के गांव के सामाजिक ढाचे को बचाने का प्रयास किया जाय। वैमनस्यता के बीज बोने की बजाय भाई-चारे की भावना को मजबूत किया जाय। उस समाजवाद को जिन्दा किया जाय जो ग्रामीण भारत की रीढ़ है। वहीं पर खुशहाली है, वहीं पर विकास है। और गांवों से होते पलायनवाद को रोकने की चाबी भी वहीं है।

‘अ’ तो आया पर ‘ज्ञ’ का ज्ञान नहीं
ग्रामीण भारत में प्राथमिक शिक्षा को मजबूत आधार देने के लिए देश की सरकार ने अनेकों कदम उठाए, मुफ्त किताबें, मुफ्त वर्दी, मुफ्त भोजन, छात्रवृत्ति और शिक्षा का अधिकार कानून भी लाया गया। मगर ये सारे प्रयास आंकड़ों में छात्रों की संख्या बढ़ाने तक ही सीमित होकर रह गए। इनमें से कोई भी उपाय ग्रामीण भारत के बचपन को ‘साक्षर’ के सतर से ऊपर उठाने में कारगर सिद्ध नहीं हुआ है। मुफ्त किताबें और वर्दी अध्यापक की अतिरिक्त आमदनी का जरिया बन गयीं तो मुफ्त भोजन ने अध्यापक को रसोइए में परिवर्तित कर दिया इसकी परिणति ये कि ग्रामीण स्कूलों में अध्यापन कार्यछोड़ खिचड़ी पकाते अध्यापक और हाथ में कटोरा पकड़े भोजन के इंतजार में रसोई के इर्द-गिर्द टहलते छात्रों का आम नजारा दिखाईदेने लगा। यहां सोचने वाली बात यह है कि आखिर इस तरह की योजना को लागू करने के पीछे सरकार की सोच क्या है? क्या वह भी यही चाहती है कि कोई भी छात्र ‘साक्षरता’ के स्तर से ऊपर ही न उठ सके। यदि नहीं तो उसे एक गैर सरकारी संस्था के उस सर्वे पर गौर करना ही होगा जिसमें ग्रामीण शिक्षा की असलियत के आंकड़े जुटाए गए हैं।
रिपोर्ट बताती है कि भारत में स्कूली शिक्षा का स्तर कितना गिरा है। बावजूद इसके कि स्कूलों में बच्चों के दाखिले बढ़े हैं और पढ़ाई बीच में ही छोड़ देने वाले बच्चों की संख्या भी घटी है। रिपोर्ट से पता चलता है कि ग्रामीण स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता लगातार घटती जा रही है। छह से 14 साल के बच्चों के दाखिले तो बढ़े हैं। लेकिन इनकी पढ़ाई के स्तर में कोईसुधार नहीं है। पांचवीं कक्षा तक के आधे से ज्यादा बच्चों के पढ़ने की क्षमता दूसरी कक्षा के बच्चों के स्तर की है। कक्षा एक के लगभग आधे बच्चे किसी भी भाषा का एक भी अक्षर नहीं पढ़ पाते, 57 प्रतिशत बच्चे अंग्रेजी नहीं पढ़ पाते, 40 प्रतिशत बच्चे एक से नौ तक की संख्या को नहीं पहचान पाते। कक्षा एक से पांच तक के 12.8 प्रतिशत बच्चे एक भी अक्षर नहीं पढ़ पाते और 10.9 प्रतिशत बच्चे एक से नौ तक के अंको को नहीं पहचानते। 2010 में कक्षा पांच के ऐसे बच्चों की संख्या 53.7 प्रतिशत थी जो कक्षा दो का पाठ नहीं पढ़ सकते थे।
ग्रामीण भारत के आधे से ज्यादा स्कूलों में शिक्षकों की कमी है कुछ स्कूल ऐसे भी हैं जहां अध्यापक हैं ही नहीं। इसके अलावा इन स्कूलों का एक दुखद पहलू यह भी है कि इनमें 70 प्रतिशत से अधिक स्कूलों में पेयजल और शौचालय की व्यवस्था नहीं है। जबकि सरकार पिछले एक दशक से इस योजना पर सालाना दस करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर रही है। फिर भी देश के लगभग 11.43 लाख ग्रामीण स्कूलों में 4.13 लाख स्कूलों में लड़कियों के लिए और 1.62 लाख स्कूलों में लड़कों के लिए शौचालय नहीं हैं। इसके साथ ही 73632 स्कूल ऐसे हैं, जहां पेयजल की सुविधा नहीं है। इन सारी सुविधा और असुविधा की विसंगतियों के बीच झूल रही है ग्रामीण भारत की शिक्षा और खामियाजा भुगत रहा है ग्रामीण बचपन जो ‘अ’ तक तो पहुंचता हे लेकिन ‘ज्ञ’ तक कब पहुंचेगा किसी को पता नहीं। नीतियां बनाने वाली सरकार को, न नीतियों की वाहक प्रशासनिक व्यवस्था को और न अंजाम देने वाले अध्यापक को।

इस लोकतंत्र में कहां है ‘लोक’
हम गौरवान्वित हैं अपनी इस उपलब्धि पर कि हमारे संविधान ने ‘लोकतंत्र’ के नाम पर हमें एक ऐसी ताकत दी है जिसका उपयोग कर भारत का हर नागरिक अपने अनुरूप एक प्रतिनिधि चुन सकता है जो हमारी जरूरतों को ध्यान में रखकर एक ऐसा ‘तंत्र’ विकसित करेगा जिसमें ‘लोक’ की भावनाएं निहित होंगी। लेकिन ऐसा न कभी हुआ था और न अब हो रहा है। देश के राजनीतिकों ने लोकतंत्र को तोड़ मरोड़ कर एक किस्म की राजशाही विकसित कर ली है। जिस व्यक्ति को हमने अपना प्रतिनिधि चुना था वह कब ‘नबाब’ बन गया यह एक पहेली सा प्रश्न बन गया है। जिसे हल करता हुआ ‘लोक’ या तो अपनी जान की कीमत पर रेलगाड़ी का हत्था पकड़े लटका दिखाई देता है या सरकारी अस्पतालों में इलाज की खाना-पूर्तियों के बीच दम तोड़ते मरीज के रूप में। कभी-कभी यही लोक सड़कों पर ‘तंत्र’ की रफ्तार में जब बाधा बनता हैतो डंडे खाता भी दिखाई देता है।
असल में हमारे देश में इसी ‘लोकतंत्र’ की जड़ से एक ऐसा तानाशाह पैदा हुआ है जो नबाबी संस्कृति का लबादा ओढ़े हुए है। यह वही संस्कृति है जो या तो पुराने सामंती युग में हुआ करती थी या अंग्रेजो के गुलामी काल में। इस संस्कृति में ‘लोक’ के लिए कभी सम्माननीय जगह नहीं बन सकी सिर्फ ‘तंत्र’ का ही बोलबाला रहा। आज के भारत में भी ‘लोकतंत्र’ के पैरोकार ‘लोक’ को ही कुचल कर आगे बढ़ रहे हैं जहां से भी ये गुजरते हैं वहां घंटों पहले यातायात रोक दिया जाता हैऔर सुरक्षा के नाम पर ‘लोक’ को डंडे के बल, सुरक्षा के सवाल पर घंटों इंतजार के लिए मजबूर कर दिया जाता है। क्योंकि यहां ‘तंत्र’ की शान का सवाल जो ठहरा। इस ‘तंत्र’ से ‘लोक’ के लिए मुलाकात करना भी बेहद मुश्किल है। पिछले कुछ समय से सुरक्षा के नाम पर ‘लोक’ की गाढ़ी कमाई भी दांव पर लगाई जा रही है। लोकतंत्र के इन ‘नबाबों’ की सुरक्षा पर अरबों रुपया प्रति वर्ष पानी की तरह बहा दिया जाता है। दलील दी जाती है कि आतंकवाद का खतरा बढ़ गया है। लेकिन यही आतंकवाद जब भीड़-भाड़ भरे बाजारों में, सिनेमा हालों में और रेलवे स्टेशनों पर ‘लोक’ को अपना निशाना बनाता है तब ‘तंत्र’ सिर्फ घड़ियाली आंसू बहाकर पीड़ित के परिवार को चंद रुपयों की सहायता देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेता है। तब उसे इस बात का कतई खयाल तक नहीं आता कि इन रुपयों से न पति का प्यार खरीदा जा सकता हैऔर न पिता का स्रेह। वह ऐसा क्यों नहीं सोचता कि जब एक जान को बचाने की खातिर अरबों रुपया फूंक दिया जाता हैतो सैकड़ों जानों की कीमत कुछ लाख में क्यों लगाई। क्यों ऐसे हालात पैदा होने दिए कि ‘लोक’ झुग्गियों में पनाह तलाशता है और तंत्र राज महलों की शान बन गया। ‘लोक’ पैरों को पेट से सटा सर्दराते गुजारता है तो ‘तंत्र’ गर्मबांहों के आलिंगन में समा जाता है। ‘लोक चिकित्सा व्यवस्था की खामियों का शिकार हो दम तोड़ता है तो ‘तंत्र’ व्यवस्था का ही दम निकाल देता है। ‘लोक’ न्याय पाने को तरसता है तो ‘तंत्र’ न्याय से आंख-मिचौली खेलता है। समझ ही नहीं आता कि यह कैसा ‘लोकतंत्र’ हैजो अपनी परिभाषा के उलट ही जनता के प्रतिनिधियों और जनता के बीच गहरी खाई खोद रहा है। जबकि लोकतंत्र का बुनियादी सिद्धांत है कि जनता जिन लोगों को अपना प्रतिनिधि चुनती है, उनसे जबाबदेही मांगने का उसे पूरा अधिकार है। जहां प्रतिनिधियों की जबाब देही तय नहीं होती वहां ‘लोकतंत्र’ के मायने ही खत्म हो जाते हैं। दुखद ये कि हमारे देश में आजकल ऐसा ही हो रहा है।’